गणेश चतुर्थी की कथा


गणपति बप्पा  मोरया , मंगलमूर्ति मोरया।




नमस्कार दोस्तों।  आज हम बात करेंगे गणेश चतुर्थी के बारे में। हम गणेश चतुर्थी क्यों मनाते है ? तो आज  मै आपको इससे जुडी कथा सुनाऊंगा ।



गणेश चतुर्थी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है।  यह  त्यौहार महाराष्ट्र में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
गणेश पुराण के अनुसार भाद्रपद मास की  शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मंगलमूर्ति गणेश जी का अवतरण तिथि बताया गया है।
गण  + पति यानी गणपति।
संस्कृत कोष अनुसार गण अर्थात पवित्र, पति अर्थात स्वामी। यानी गणपति अर्थात पवित्रों  के स्वामी।
आईये जानते है गणेश चतुर्थी की कथा क्या थी।


शिवपुराण के अंतर्गत, रूद्र सहिता के चथुर्त खंड में यह  वर्णन है  की माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपनी मैल  से एक  बालक को उत्पन्न करके उसे  अपना द्वारपाल बना दिया।  शिवजी ने जब प्रवेश करना चहा तब बालक ने उन्हें रोक दिया। इस पर शिव गणों  ने बालक  के साथ   भयंकर युद्ध किया परन्तु संग्राम  उसे कोई पराजित न कर सका। अंत में भगवान् शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सर काट दिया। इससे माता पार्वती क्रोधित हो उठी। उन्होंने प्रलय  करने की ठान ली। भयभीत देवताओं ने ऋषि नारद की  सलाह पर जगदंबा   स्तुति  करके उन्हें शांत  किया। शिवजी के निर्देशनपर विष्णु  जी उत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जिव यानी हाथी के सर को काट लाये और बालक के धड़ पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। माता पार्वती ने  बड़े आनंद  से उस गजमुख बालक को अपने ह्रदय से लगा लिया। और सारे देवी देवताओं ने अग्रणी होने का आशीर्वाद दिया। ब्रह्मा विष्णु महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्र पूज्य होने का वरदान भी दिया।  भगवान् शंकर ने बालक से कहा गिरिजानंदन  विघ्ननाश  करने में तेरा नाम सर्वोपरि होगा।  तू सबका पूज्य बनकर मेरे समस्त गणों  का अध्यक्ष हो जाये। गणेश्वर तू भाद्रपद मास  के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी पर अवतरित हुआ है , इस तिथि में तेरा व्रत रकनेवालों के  सभी विघ्नों का नाश हो जाए और  उन्हें सब सिद्धियां प्राप्त हो जाए। वर्ष पर्यन्त गणेश चतुर्थी की व्रत रखने वालों की मनोकामना अवश्य पूरी  होती है।

अधिक जानकारी के लिए निचे दिए हुए वीडियो को देखे।



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