कर्म के फल और आपका भविष्य। ( Law of Karma )


आज हम बात करेंगे कर्म के बारे में।
कर्म क्या होते है? कर्म कितने प्रकार के होते है ? कर्म के फल हमें कैसे मिलते है ?


सृस्टि की रचना कर्म के सिद्धांत पर आधारित है। अगर एक बार आप सही तरीके से कर्म के सिद्धांत को जान पाते है, तो जीवन में घटने वाली हर घटना के कारन आप समज पाएंगे। सबसे पहले हम जाननेकी कोशिश करेंगे की हम कर्म  कैसे करते है।  जैसे ही कोई प्राणी जन्म लेता है वह कर्म परायण बन जाता है। हर समय हम जो भी करते है वो हमारे कर्म ही है। खाना, पीना, उठना, बैठना, बोलना, सोना, इत्यादि।  हम अपने सारे कर्म अपने पांच कर्मइन्द्रिये द्वारा करते है। आखें, कान, नाक, मुख और त्वचा यह हमारे पांच कर्मइन्द्रिये है। हम क्या देखते है, क्या सुनते है, क्या बोलते है, क्या खाते है, शरीर और मन द्वारा हम जो भी कर्म करते है वह सारे हमारे मेमॉरी में  रिकॉर्ड होते रहते है और उसीसे हमारे संस्कार बनते है।  और फिर जैसे हमारे संस्कार होते है उसी तरह के कर्म करने के लिए हम प्रेरित होते है। हमारा स्वभाव और संस्कार कई चीज़ों पर निर्भर रहता है, जैसे हमारे पिछले जन्म के कर्म, हमारे माता पिता के संस्कार, हम जिन जिन लोगों से जुड़ते है उनके संस्कार का प्रभाव, हमारे समाज एवं देश के संस्कार, इत्यादि।  आप के संस्कार कैसे बनेंगे ये निर्भर होता है आपका विश्वास किन लोगों पर है और उस विश्वास की  तीव्रता कितनी है।  आप उन्हीके संस्कार और स्वभाव को  नकल करना पसंद करेंगे जिनपर आप ज्यादा विश्वास  रखते है।

हमारे हर  कर्म का फल निश्चित ही मिलता है। वह फल तुरंत भी मिल सकता है, एक हफ़्ते बाद मिल सकता है, या एक साल बाद मिल सकता, या पचास साल बाद मिल सकता है, या फिर अगले जन्म में मिल सकता है।  जिन कर्म के फल आपको तुरंत प्राप्त नहीं होते  है, वह कर्म संचित हो जाते है और वह आपको भविष्य में भुगतने को मिलेगा।  इसे संचित कर्म कहते है।
आप किस घर में जन्म लेंगे, आप स्वस्थ पैदा होंगे या कोई विकलांगता के साथ पैदा होंगे इत्यादि ऐसे आपके जीवन में अनेक परिस्तिथियाँ जो आपके नियंत्रण से बहार है, उसे  प्रारब्ध कहते है या हम अंग्रेजी में डेस्टिनी (Destiny) कहते है। आपका प्रारब्ध आपके पिछले जन्मों  के कर्म से तय होता है।  वह संचित कर्म का ही  एक हिस्सा होता है जो आपको इस जन्म में आपको भुगतना होता है।
क्रियामान कर्म वह होते है जो आप वर्त्तमान काल में क्रिया (actions) कर रहे होते है।
क्रियामान कर्म आपके नियंत्रण में होते है, आप क्या एक्शन (action) लेते है ये आप निश्चय कर सकते है। लेकिन आप अपना प्रारब्ध बदल नहीं सकते, उसे आपको भुगतना ही होता है। आप अपने क्रियमान कर्म से अपना भविष्य बनाते है।

तीन प्रकार के कर्म  - कर्म, अकर्म और विकर्म।

जो भी कर्म हम निष्काम भाव से  करते है, यानि की कोई भी फल प्राप्ति की इच्छा नहीं रखते हुए, उसके फल हमें भुगतने नहीं पड़ते है, इस प्रकार के कर्म को अकर्म कहते है।

जो कर्म हम सकाम भाव से करते है, यानि की अगर हम किसी निश्चित फल की अपेक्षा करते हुए कोई कर्म करते है, उसके फल हमें निश्चित ही भुगतने मिलते है।

असत्य, कपट, हिंसा आदि अनुचित और निषेदीय कर्म को विकर्म कहते है।  इन कर्मो के फल स्वरुप मनुष्य को दुःख और कष्ट भुगतने पड़ते है।

अगर आप निरंतर सकाम कर्म में लगे रहते है, तो आपको उन कर्मो को भोगने के लिए बार बार जन्म लेना पड़ता है। अगर आप इस जन्म मृत्यु के चक्र से छूटना चाहते हो और मुक्ति पाना चाहते हो तो आपको निष्काम भाव से कर्म  करना चाहिए। निष्काम कर्म में आप किसी फल की अपेक्षा नहीं रखते। आप सदैव आनंदित रहते हो। इस प्रकार आप कर्म बंधन से मुक्त हो सकते हो।

मैंने शुरुवात में बात की थी की मनुष्य कर्म अपने संस्कार के अनुसार करता है। अपने कई बार देखा होगा की बेटा अपने माता पिता के स्वभाव से अलग होता है, एक ही घर में बड़े होये हुए भाई बहन अलग अलग स्वभाव के होते है, तो ऐसा क्यों होता है ? इसका कारन है मनुष्य के पिछले जन्मो के संस्कार (मेमॉरी) शुष्कम रूप से इस जन्म में साथ लेके आता है।  क्या मनुष्य अपने संस्कार बदल सकता है ? इसके बारे में मै अगले पोस्ट में बात करूँगा। आपको ये पोस्ट कैसी लगी निचे कमेंट बॉक्स में टाइप करके जरूर रिप्लाई देना।

धन्यवाद्।



संदर्भ - भगवद्गीता 

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