भगवान के सच्चे भक्तों के गुण



भगवान के सच्चे भक्तों के गुण


संदर्भ - भगवदगीता, अध्याय १२ - भक्तियोग


जो किसी से द्वेष नहीं करता, लेकिन सभी जीवों  का दयालु मित्र है, जो अपने को स्वामी नहीं मानता और मिथ्या अहंकार से मुक्त है, जो सुख दुख में समभाव रहता है, सहिष्णु है, सदैव आत्मतुष्ट रहता है, आत्मसंयमी है तथा जो निश्चय के साथ मुझमें मन तथा बुद्धि स्थिर करके भक्ति में लगा रहता है, ऐसा भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है। (अध्याय १२, श्लोक १३ & १४)

जिससे  किसी को कष्ट नहीं पहुँचता तथा  जो अन्य किसी के द्वारा विचलित नहीं किया जाता, जो सुख-दुख में, भय तथा चिन्ता में समभाव रहता है, वह मुझे अत्यन्त  प्रिय है। (अध्याय १२, श्लोक १५)


मेरा ऐसा भक्त जो सामान्य कार्य-कलापों पर आश्रित नहीं है, जो शुद्ध है, दक्ष है, चिन्तारहित है, समस्त कष्टों से रहित है और किसी फल के लिए प्रयत्नशील नहीं रहता, मुझे अतिशय प्रिय है। (अध्याय १२, श्लोक १६)

जो न  कभी हर्षित होता है, न  शोक करता है, जो न  तो पछताता है, न  इच्छा करता है, तथा जो शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार की वस्तुओं का परित्याग कर देता है, ऐसा भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है। (अध्याय १२, श्लोक १७)

जो मित्रों तथा शत्रुओं के लिए समान है, जो मान तथा अपमान, शीत तथा गर्मी, सुख तथा दुख, यश तथा अपयश में समभाव रखता है, जो दूषित संगति से सदैव मुक्त है, जो सदैव मौन और किसी भी वस्तु से संतुष्ट रहता है, जो किसी प्रकार के घर-बार की परवाह नहीं करता, जो ज्ञान में दृढ़ है और जो भक्ति में संलग्न है - ऐसा पुरुष मुझे अत्यंत प्रिय है। (अध्याय १२, श्लोक १८ & १९)


जो इस भक्ति के अमर पथ का अनुसरण करते है, और जो मुझे ही अपना चरम लक्ष्य बना कर श्रद्धासहित पूर्णरूपेण संलग्न रहते है, वे भक्त मुझे अत्यधिक प्रिय है। (अध्याय १२, श्लोक २०)




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